भारत में गर्भावस्था के दौरान लिंग जाँच व कन्या भ्रूण हत्या सामाजिक बुराई के रूप में व्याप्त है। वंशावृद्धि के लिए पुत्र प्राप्ति की प्रबल इच्छा रखना लिंग जाँच का एक प्रमुख कारण बना है। वर्तमान में महिलाओं के साथ हो रहे घृणित अपराधों के कारण भी लिंग जाँच का पैमाना बढ़ा है।
उपरोक्त समस्याओं की वजह से भारत का लिंगानुपात असंतुलित है। हालांकि भारत सरकार ने इस गंभीर समस्या से निपटने व महिलाओं के हितों की सुरक्षा हेतु कई कठोर कानून बनाए हैं, जिनका उद्देश्य गर्भावस्था से पहले और गर्भावस्था के दौरान लिंग चयन (Sex Selection) पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना है।


भारतीय समाज में लिंग चयन की पारंपरिक मान्यताएं

भारत में पुरानी मान्यताओं और धर्म शास्त्रों का गहरा प्रभाव है:

  • पुत्र ही वंश को आगे बढ़ाता है और पितरों को मोक्ष प्रदान करता है।
  • पिता के अंतिम संस्कार का अधिकार भी पुत्र को दिया गया है।
  • संपत्ति का वारिस पुत्र को माना जाता है।
  • दहेज प्रथा कन्या भ्रूण हत्या की बड़ी वजह है।
  • पुत्र को परिवार का सहारा और पुत्री को पराया धन मानना आम सोच है।


तकनीकी प्रगति और उसका दुरुपयोग

  • 1990 के दशक में आई अल्ट्रासाउंड तकनीक के बाद लिंग जाँच व कन्या भ्रूण हत्या के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई।
  • “छोटा परिवार – सुखी परिवार” की सोच से प्रभावित होकर लोग दूसरी संतान के रूप में पुत्र चाहते हैं।
  • महंगाई और बेरोजगारी के कारण बेटी के पालन-पोषण और विवाह की चिंता बढ़ जाती है।
  • अल्ट्रासाउंड एक ओर रोगियों के लिए वरदान है तो दूसरी ओर कन्या भ्रूण के लिए अभिशाप।


चिकित्सकों और डायग्नोस्टिक सेंटरों की भूमिका

  • कुछ डॉक्टर और आशा बहुएं पैसों के लालच में लिंग जांच जैसे अपराध में संलिप्त हो जाते हैं।
  • कई बार शिक्षित गाइनोकॉलॉजिस्ट और रेडियोलॉजिस्ट महिलाएं भी इस अपराध में भागीदार बनती हैं।
  • यह हमारे समाज के लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।


लिंग जांच और भ्रूण हत्या को रोकने के लिए बने कानून

1. PCPNDT Act, 1994

  • गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (Pre-Conception and Pre-Natal Diagnostic Techniques) अधिनियम 1994 में पारित किया गया।
  • 2003 में इस अधिनियम में संशोधन कर इसे और प्रभावी बनाया गया।
  • उद्देश्य: गर्भधारण से पहले और गर्भावस्था के दौरान लिंग चयन पर रोक लगाना।
  • [Sec. 3] भ्रूण, शुक्राणु, अंडाणु या युग्मक का पृथक्करण निषेध।
  • [Sec. 6] लिंग की जानकारी देना या चयन करना पूर्णतः वर्जित।
  • दंड: 3-5 वर्ष तक की सजा और ₹10,000 से ₹1,00,000 तक जुर्माना।

2. MTP Act, 1971 (Medical Termination of Pregnancy Act)

  • गर्भावस्था के चिकित्सीय समापन के लिए बनाया गया कानून।
  • 2021 में इस कानून में भी संशोधन किया गया जिससे इसे अधिक प्रभावी बनाया गया।


भारत में लिंगानुपात पर प्रभाव

  • अल्ट्रासाउंड तकनीक आने के बाद लिंगानुपात असंतुलित हो गया।
  • 2001 की जनगणना: 1000 पुरुषों पर 933 महिलाएं
  • 2011 की जनगणना (संशोधित PCPNDT Act के बाद): 1000 पुरुषों पर 943 महिलाएं
  • यह सुधार कानून की सख्ती और जागरूकता के कारण संभव हुआ।


गर्भस्थ शिशु के संवैधानिक और प्राकृतिक अधिकार

  1. जीवन का अधिकार (अनुच्छेद 21): अजन्मे शिशु को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार।
  2. भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराएं 312 से 316: जबरन या अवैध गर्भपात को अपराध माना गया है।
  3. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 20: गर्भस्थ शिशु को संपत्ति में अधिकार।
  4. जन्म लेने का अधिकार: प्रत्येक गर्भस्थ शिशु को जन्म लेने का अधिकार है।
  5. जीवन जीने का अधिकार: भोजन, सुरक्षा, और पोषण जैसी मूल आवश्यकताओं का अधिकार।
  6. विकास का अधिकार: शिशु को संपूर्ण रूप से विकसित होने का अधिकार।

निष्कर्ष

भारत जैसे बहुसंख्यक आबादी वाले देश में लिंग जांच और भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बुराई को समाप्त करना एक चुनौती है।
इसका समाधान शिक्षा, चिकित्सा सुविधा, और गरीबी उन्मूलन के ज़मीनी प्रयासों से ही संभव है।
हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि लड़का और लड़की दोनों को समाज में समान अधिकार और अवसर प्राप्त हों।
डॉक्टरों और डायग्नोस्टिक सेंटर्स की नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वे लिंग जांच जैसी अवैध गतिविधियों में भाग न लें और अगर उन पर दबाव डाला जाए तो कानून का सहारा लें।

तभी हमारा समाज एक सुरक्षित और समान भविष्य की ओर बढ़ सकेगा – जहां गर्भ में पल रही हर बच्ची सुरक्षित और सम्मानित होगी।

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